हृदयाघात से अचेत हुए रामनाथ को परिजनों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। नर्सों ने रामनाथजी की सामाजिक हैसियत और साख के कारण अच्छी तीमारदारी की जिससे उन्हें जल्दी ही होश आ गया। उनके होश में आते ही नर्सें डाॅक्टर को बुला लाईं। झक
सफेद एप्रेन पहने हुए डाॅक्टर को आते देख रामनाथ थर थर कांपने लगे। रामनाथ को घेरे हुए खड़े उनके परिजन समझ ही नहीं पा रहे थे कि अचानक रामनाथ को क्या हो गया। अभी तो होश में आकर सामान्य अवस्था थी अब वे कंपकंपाने क्यों लगे।
सफेद एप्रेन पहने हुए डाॅक्टर को आते देख रामनाथ थर थर कांपने लगे। रामनाथ को घेरे हुए खड़े उनके परिजन समझ ही नहीं पा रहे थे कि अचानक रामनाथ को क्या हो गया। अभी तो होश में आकर सामान्य अवस्था थी अब वे कंपकंपाने क्यों लगे।
वे तेजी से डाॅक्टर के पास गए और रामनाथ का शीघ्र इलाज करने के लिए कहा। डाॅक्टर को और पास आता हुआ देखकर उन्हें लगा कि उनके सामने साक्षात यमदूत चला आ रहा है। वे धीमी आवाज में बोले ‘‘इस डाॅक्टर से मुझे इलाज नहीं कराना है।’’ और वे फिर से बेहोश हो गए।
सभी लोग आश्चर्य-चकित थे कि रामनाथ इन डाॅक्टर साहब से इलाज कराने के नाम पर इतना भयभीत क्यों हो रहे हैं। अचानक से फिर क्यों बेहोश हो गए।
रामनाथ जी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से डाॅक्टर नाराज होने लगा। नर्सों एवं परिजनों ने डाॅक्टर साहब को समझा-बुझाकर शांत किया और किसी दूसरे डाॅक्टर से इलाज करने के लिए अनुनय विनय की।
रामनाथ जी की खराब हालत देखकर अस्पताल प्रशासन ने एक युवा हृदयरोग विशेषज्ञ को आपातकालीन ड्यूटी पर बुलाकर रामनाथ के इलाज के लिए भेजा।
जैसे ही रामनाथ ने युवा डाॅक्टर को आते देखा उनकी हालत और ज्यादा खराब होने लगी। उनकी घिग्घी बंध गई। गले से मुश्किल से आवाज निकल रही थी ‘‘मुझे इस अस्पताल में इलाज नहीं कराना है। मुझे घर ले चलो। मैं अपने प्रदेश के इन डाॅक्टरों से इलाज नहीं कराऊँगा। मुझे दिल्ली या और कहीं ले चलो।’’ एक बार फिर से वे अचेत हो गए।
अचेतावस्था में वे बड़बड़ाने लगे ‘‘वो देखो, वो देखो व्यापम मंथन हो रहा है। पास फेल के अमृत और विष कलश निकल रहे हैं। मोहिनी अपने हिसाब से कलशों को रख रही है।’’
थोड़ी देर गहरी अचेतावस्था में वे मौन रहे। अचानक से फिर कहने लगे ‘‘ अमृत और विष कलशों का बंटवारा हो रहा है। ज्ञान की देवी सरस्वती के उपासकों के सामने विष कलश रखे गए हैं। लक्ष्मी उपासकों के चेहरों की चमक से साफ दिख रहा है कि उनके आगे अमृत कलश ही रखे जाएंगे।’’
‘‘सारे देवतागण (अधिकारी और नेता) लक्ष्मीजी की चकाचैंध में मग्न होकर मौन बैठे हैं। उनके नीर क्षीर करने के विवेक का कहीं अता पता नहीं था। वे अपनी आँखों पर पट्टी बांधे बैठकर सागर द्वारा व्यापम मंथन में निकाले जा रहे मनपसंद रत्नों (चुने हुए प्रतियोगियों) पर अपनी मुहर लगाते जा रहे थे।’’
‘‘वो देखो देवता (पात्र उम्मीदवार) अपने अपने कलश (ओ एम आर शीट) फटाफट भरकर संतोष से दमक रहे हैं। असुर लोगों ने अपने अपने कलश (ओ एम आर शीट) खाली छोड़ दिए हैं। पर वो देखो, सरस्वती उपासकों के कलशों (ओ एम आर शीट) में विष भरा जा रहा है। लक्ष्मी वाहकों के खाली कलशों (ओ एम आर शीट) में अमृत भरा जा रहा है।’’
‘‘वो देखो कुछ असुरों की जगह दूसरे असुर आकर बैठ गए हैं और फटाफट अपना काम निपटा रहे हैं। सारे नियंत्रक चुपचाप बैठे हैं।’’
‘‘वो देखो व्यापमं मंथन पूरा हो गया है। परिणाम सामने आ गए हैं। देवता (पात्र उम्मीदवार) मोहिनी की चमक से छले जाने पर अपनी गर्दन नीचे किए बैठकर अपना आत्ममंथन कर रहे हैं। असफल होने के कारण तलाश रहे हैं। अमृत की जगह विषपान कर समाज की लानत मलानत झेल रहे हैं।
असुर (अपात्र उम्मीदवार) अमृत पान कर खुशी से झूम रहे हैं। शान से अपनी सफलता का जश्न मना रहे हैं। काॅलेजों में प्रवेश ले रहे हैं।’’
‘‘वो देखों उन्हीं में से एक असुर आ रहा है मेरा इलाज करने के लिए। मैं इलाज नहीं कराऊँगा। मुझे कहीं बाहर ले चलो।’’
अपनी बात पर किसी का ध्यान न जाते देख रामनाथ ‘‘ मुझे इलाज नहीं कराना है।’’ कहकर अस्पताल से भाग लिए। सारे लोग उनको पकड़ने के लिए पीछे भागने लगे।

