Saturday, November 8, 2014

मंथन

हृदयाघात से अचेत हुए रामनाथ को परिजनों ने सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। नर्सों ने रामनाथजी की सामाजिक हैसियत और साख के कारण अच्छी तीमारदारी की जिससे उन्हें जल्दी ही होश आ गया। उनके होश में आते ही नर्सें डाॅक्टर को बुला लाईं। झक
सफेद एप्रेन पहने हुए डाॅक्टर को आते देख रामनाथ थर थर कांपने लगे। रामनाथ को घेरे हुए खड़े उनके परिजन समझ ही नहीं पा रहे थे कि अचानक रामनाथ को क्या हो गया। अभी तो होश में आकर सामान्य अवस्था थी अब वे कंपकंपाने क्यों लगे।

वे तेजी से डाॅक्टर के पास गए और रामनाथ का शीघ्र इलाज करने के लिए कहा। डाॅक्टर को और पास आता हुआ देखकर उन्हें लगा कि उनके सामने साक्षात यमदूत चला आ रहा है। वे धीमी आवाज में बोले ‘‘इस डाॅक्टर से मुझे इलाज नहीं कराना है।’’ और वे फिर से बेहोश हो गए।

सभी लोग आश्चर्य-चकित थे कि रामनाथ इन डाॅक्टर साहब से इलाज कराने के नाम पर इतना भयभीत क्यों हो रहे हैं। अचानक से फिर क्यों बेहोश हो गए।

रामनाथ जी के इस अप्रत्याशित व्यवहार से डाॅक्टर नाराज होने लगा। नर्सों एवं परिजनों ने डाॅक्टर साहब को समझा-बुझाकर शांत किया और किसी दूसरे डाॅक्टर से इलाज करने के लिए अनुनय विनय की।
रामनाथ जी की खराब हालत देखकर अस्पताल प्रशासन ने एक युवा हृदयरोग विशेषज्ञ को आपातकालीन ड्यूटी पर बुलाकर रामनाथ के इलाज के लिए भेजा।

जैसे ही रामनाथ ने युवा डाॅक्टर को आते देखा उनकी हालत और ज्यादा खराब होने लगी। उनकी घिग्घी बंध गई। गले से मुश्किल से आवाज निकल रही थी ‘‘मुझे इस अस्पताल में इलाज नहीं कराना है। मुझे घर ले चलो। मैं अपने प्रदेश के इन डाॅक्टरों से इलाज नहीं कराऊँगा। मुझे दिल्ली या और कहीं ले चलो।’’ एक बार फिर से वे अचेत हो गए।

अचेतावस्था में वे बड़बड़ाने लगे ‘‘वो देखो, वो देखो व्यापम मंथन हो रहा है। पास फेल के अमृत और विष कलश निकल रहे हैं। मोहिनी अपने हिसाब से कलशों को रख रही है।’’

थोड़ी देर गहरी अचेतावस्था में वे मौन रहे। अचानक से फिर कहने लगे ‘‘ अमृत और विष कलशों का बंटवारा हो रहा है। ज्ञान की देवी सरस्वती के उपासकों के सामने विष कलश रखे गए हैं। लक्ष्मी उपासकों के चेहरों की चमक से साफ दिख रहा है कि उनके आगे अमृत कलश ही रखे जाएंगे।’’

‘‘सारे देवतागण (अधिकारी और नेता) लक्ष्मीजी की चकाचैंध में मग्न होकर मौन बैठे हैं। उनके नीर क्षीर करने के विवेक का कहीं अता पता नहीं था। वे अपनी आँखों पर पट्टी बांधे बैठकर सागर द्वारा व्यापम मंथन में निकाले जा रहे मनपसंद रत्नों (चुने हुए प्रतियोगियों) पर अपनी मुहर लगाते जा रहे थे।’’

‘‘वो देखो देवता (पात्र उम्मीदवार) अपने अपने कलश (ओ एम आर शीट)  फटाफट भरकर संतोष से दमक रहे हैं। असुर लोगों ने अपने अपने कलश (ओ एम आर शीट) खाली छोड़ दिए हैं। पर वो देखो, सरस्वती उपासकों के कलशों (ओ एम आर शीट) में विष भरा जा रहा है। लक्ष्मी वाहकों के खाली कलशों (ओ एम आर शीट) में अमृत भरा जा रहा है।’’

‘‘वो देखो कुछ असुरों की जगह दूसरे असुर आकर बैठ गए हैं और फटाफट अपना काम निपटा रहे हैं। सारे नियंत्रक चुपचाप बैठे हैं।’’

‘‘वो देखो व्यापमं मंथन पूरा हो गया है। परिणाम सामने आ गए हैं। देवता (पात्र उम्मीदवार) मोहिनी की चमक से छले जाने पर अपनी गर्दन नीचे किए बैठकर अपना आत्ममंथन कर रहे हैं। असफल होने के कारण तलाश रहे हैं। अमृत की जगह विषपान कर समाज की लानत मलानत झेल रहे हैं।

असुर (अपात्र उम्मीदवार) अमृत पान कर खुशी से झूम रहे हैं। शान से अपनी सफलता का जश्न मना रहे हैं। काॅलेजों में प्रवेश ले रहे हैं।’’

‘‘वो देखों उन्हीं में से एक असुर आ रहा है मेरा इलाज करने के लिए। मैं इलाज नहीं कराऊँगा। मुझे कहीं बाहर ले चलो।’’ 

अपनी बात पर किसी का ध्यान न जाते देख रामनाथ ‘‘ मुझे इलाज नहीं कराना है।’’ कहकर अस्पताल से भाग लिए। सारे लोग उनको पकड़ने के लिए पीछे भागने लगे।

Tuesday, October 21, 2014

Happy Diwali

दीपों का मंगल उत्सव
रहे न कहीं अंधियारा
गली मोहल्ले झोपड़पट्टी
चमके चहके जग सारा
धूमधडा़का शोर-शराबे में
छूटे न कोई दुखियारा

शुभ दीपावली!

Thursday, March 13, 2014

प्रभो! हमें भैंसें बना दो!

भगवान चित्रगुप्त, देवर्षि नारद और ब्रह्मा जी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर रहीं थीं। वे आपस में गहन मंत्रणा में डूबे हुए थे। उनके सामने आवेदनों का ढेर लगा हुआ था। हर पल आवेदन पर आवेदन आते जा रहे थे। हर आवेदन में एक ही मांग थी ‘प्रभो! हमें भैसें बना दो।’

भगवान चित्रगुप्त, देवर्षि नारद और ब्रह्मा जी बहुत चिंतित हो रहे हैं कि आखिर उनकी सबसे समझदार योनि मनुष्य को क्या हो गया है कि हर मनुष्य आत्मा पृथ्वी लोक पर भैंस बन कर जाना चाहती है।
आधुनिक मशीनों से सज्जित यमलोक में कम्प्यूटर पर बैठी अप्सरा ने आए हुए आवेदनों का विश्लेषण कर चित्रगुप्त जी को चैंकाया, ‘‘सर ये सारे आवेदन एक खास प्रदेश से आई हुई आत्माओं के हैं, विशेषकर एक विशेष नगर से आई हुई आत्माओं के।’’
कम्प्यूटर गणिका की बात सुनकर चित्रगुप्त जी परेषान हो उठे कि आखिर खास प्रदेश की जनता को क्या हो गया है जो सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि को त्यागकर भैंस बनना चाहती है। जबकि हर आत्मा मनुष्य योनि में जाने को लालायित रहती है क्योंकि मनुष्य योनि में ही प्राणी को बुद्धि और विवके प्राप्त होता है जिससे वह योग और भोग को अपने अपने हिसाब से प्राप्त करता रहता है।
चित्रगुप्त जी की चिंता को भांपते हुए देवर्षि नारद बोले ‘‘प्रभू में पृथ्वीलोक पर जाकर इसका पता लगाता हूँ।’’
‘‘हाँ हाँ देवर्षि, आप शीघ्र जाकर पता लगाइए। हमें इन आवेदनों का तुरंत निपटारा करना है अन्यथा लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत हम पर कार्रवाई हो सकती है।’’
नारद जी तुरंत यात्रा पर निकल पड़े। अदृष्य होकर विशेष नगर पहुँच गए और दिव्य दृष्टि से देखने लगे। कड़कड़ती ठंड में लोग तंबुओं में रह रहे हैं। बच्चे और बूढ़े लगभग नंगे बदन ठिठुर रहे हैं। उनके पास ओढ़ने के लिए पर्याप्त कंबल और पहनने के लिए गर्म कपड़े नहीं हैं। खाने के लिए भरपेट भोजन भी नहीं है।
उनकी दिव्य दृष्टि घूमी, उन्होंने देखा कि वातानुकूलित तबेले में भैंसें आराम से बैठी पगुरा रहीं हैं। उनके सामने मध्यान्ह भोजन के लिए आया हुआ उत्तम क्वालिटी का पोषण आहार रखा हुआ है जिसे खाकर वे हृष्ट-पुष्ट हो रहीं हैं। सेवक लोग स्वयं हड्डियों का ढांचा बनकर भैंसों की सेवाकर उन्हें तंदुरुस्त बनाने में जुटे हैं।
तभी उनकी दिव्य दृष्टि ने देखा कि तबेले से भैंसें गायब हो गई हैं। तबेले में हड़कम्प मच गया है। महकमें के आला पुलिस अफसरों का वहाँ जमघट लग गया है। सभी के माथे पर चिंता की लकीरें खिंची हुई हैं। स्निफर डॉग स्क्वाड सूंघ सूंघ कर इधर उधर दौड़-भाग कर अपहरण कर्ताओं का पता लगा रहा है। पूरा प्रशासन सारा महत्वपूर्ण प्रशासनिक काम रोककर, भैंसों के अपहरण की गुत्थी सुलझाने में लगा हुआ है।
पुलिस महकमें ने अपनी कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए चैबीस घंटे में अपहरण का पर्दाफाश कर दिया और भैंसें तबेले में वापस पहुँच गईं।
तबेले का मालिक भैंसों के गले में लिपट कर कह रहा है ‘‘हमारी भैंसें विक्टोरिया से कम नहीं हैं।’’
दिव्य दृष्टि फुटपाथों, सड़कों पर घूमी। चारों तरफ भूख गरीबी अपना तांडव मचा रही है वहीं एक मेले में सरकार हीरोइनों को नचा रही है। तबेलों में जानवर पोषण आहार खा रहे हैं वहीं स्कूलों में सड़ा हुआ मध्यान्ह भोजन खाकर बच्चे बीमार पड़ रहे हैं।
अचानक देवर्षि ने देखा कि एक गरीब व्यक्ति आला पुलिस अफसर के पैरों को अपने आंसुओं से भिगोता हुआ गिड़गिड़ा रहा है ‘‘साब एक साल हो गया मेरी लड़की को गायब हुए। साब कुछ तो पता लगा दो कि मेरी लड़की को कौन ले गया है वह अब जिंदा है या मार दी गई है।’’
अफसर दहाड़ रहा है ‘‘तुम्हें तो कोई काम है नहीं। हम लोग फालतू बैठे हैं क्या? पता लगा रहे हैं। पता चलते ही तुम्हें बता देंगे।’’
फिर मन ही मन बड़बड़ा रहा है ‘खोजी कुत्ते भी सूंघ सूंघ कर हार गए उन्हें घर से गरीबी की बू के अलावा कोई बू नहीं मिली। वे चारों तरफ फैली गरीबी की बू में कन्फ्यूज्ड होकर रह गए। अब उस लड़की का पता कैसे लगाएं।’
पूरा प्रदेश तबेला बना हुआ है। अस्पतालों में डाक्टर पिट रहे हैं। दफ्तरों में अफसरों से झूमा-झटकी हो रही है। स्कूलों में मास्टरों से बदतमीजी हो रही है। महिलाओं और लड़कियों को सरेआम प्राकृतिक अवस्था में पहुँचाया जा रहा है। बंदूको की गोलियों से बच्चों के कंचों की तरह खेला जा रहा है। दबंग लोग आम आदमी को भेड़ों की तरह हाँक रहे हैं। पुलिस भेड़ों की जगह भेडि़यों की रक्षा में लगी है।
देवर्षि यह माहौल देखकर घबरा गए। तुरंत ही नारायण नारायण की जगह भैंस भैंस कहते हुए वापस चल दिए। वापसी में एक आत्मा जिसकी अभी अभी गोली मारकर हत्या उसके ही नेता ने कर दी थी नारद जी के साथ चिपक ली।
यमलोक में आवेदनों के ढेर में दबे हुए भगवान चित्रगुप्त और ब्रह्मा जी को मुष्किल से ढूंढ कर नारद जी कुछ बयान करते उससे पहले ही साथ आई आत्मा बोल पड़ी ‘‘बना दो बना दो, प्रभो! सारी जनता को किसी मंत्री की भैंसें बना दो ताकि उन्हें भी भोजन पानी और सुरक्षा तो मिल सके।’’