समीक्षा
पुस्तक - ब्रह्मपुत्र से सांगपो -एक सफ़रनामा
लेखक - दयाराम वर्मा
प्रकाशक- बोधि प्रकाशन जयपुर
यात्रा महज किसी स्थान की कोलतार या मिट्टी भरी सड़कों पर दौड़ती हुई देह नहीं होती है बल्कि गुजरती है देह जिन-जिन स्थानों व रास्तों से, वहाँ की आबोहवा, वहाँ का सौंदर्य, वहाँ की संस्कृति, वहाँ का रहन-सहन, वहाँ का इतिहास टकराता है जिस्म से तो फलित होती हैं सैकड़ों परिकल्पनाएं।
आकार लेते हैं विभिन्न रिश्ते।
अनुभूति होती है तरह-तरह के लौकिक, अलौकिक और नैसर्गिक अहसासों की।
जिनमें से कुछ जिस्म से होकर रूह तक दस्तक देते हैं। कुछ भुला दिए जाते हैं समय की गर्त में।
यात्रा के दौरान ध्वनित होती अनुगूँज स्मृतियाँ बन चिर स्थान बना लेती हैं हृदय में, मन में, चिंतन में, तब बन जाती है वह यात्रा एक मधुर सफरनामा।
बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है सुदूर उगते सूरज के प्रदेश अरूणाचल प्रदेश के तुतिंग और गेलिंग के सफर और वायुसेना में पहली पदस्थि की अपनी भूली बिसरी स्मृतियाें को अपने सफरनामा "ब्रह्मपुत्र से सांगपो" में दयाराम वर्मा जी ने।
वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश पंकज जी की भूमिका शीर्षक - वृतांत ही नहीं, एक संस्कृति का आख्यान भी, सफरनामा के सार की एक लाइन में व्याख्या कर देता है। "ब्रह्मपुत्र से सांगपो" से गुजरते हुए पाठक न केवल वर्णित स्थानों की सदृश्य मानसिक यात्रा करता रहता है बल्कि वहाँ के समाज और संस्कृति से रूबरू होता चलता है।
इस सफरनामा को लिखने से पहले दयाराम वर्मा जी ने विभिन्न ग्रंथों से बहुत सारी जानकारियां जुटाई हैं। संदर्भित ग्रंथों की सूची पुस्तक के अंत में परिशिष्ट में दी गई है। जो इस सफरनामा को प्रामाणिक दस्तावेज बनाती है। अरूणाचल की जनजातियों के मानव विज्ञान शोधार्थियों को यह पुस्तक मददगार साबित होगी।
दयाराम वर्मा जी के प्रथम उपन्यास सियांग के उस पार की विषय-वस्तु भी तुतिंग और सियांग ही है। वह उपन्यास अरूणाचल के सौंदर्य के साथ-साथ प्रेम का आख्यान भी है।
सभ्य समाज जिस कारण से आदिवासियों को पिछड़ा और असभ्य समझता है वास्तव में वह जनजातियों का भोलापन, निष्कपटता, निश्छलता और मिलनसारिता है। जिसकी छाप मानव मस्तिष्क में अमिट रहती है। 1988-89 में पदस्थि के दौरान लामांग दीदी, याकेन निजो, कामुत के इन्हीं अपनत्व भरी सुखद स्मृतियाें के वशीभूत होकर आदिवासी क्षेत्रों की कठिनाइयों को दरकिनार करते हुए दयाराम वर्मा सपरिवार तुतिंग के सफर पर निकल पड़े। जिसका कथात्मक रूप में सहज और सरल भाषा में उपन्यास में वर्णन किया गया है।
यह सफरनामा वास्तव में एक निजी यात्रा न होकर मेजबान आदिवासियों लामांग तेदो, कामुत निजो, याकेन निजो और ओलाक की पारंपरिक आदिवासी मेजबानी के माधुर्य से परिपूर्ण है।
इसमें अरुणाचल प्रदेश की संस्कृति, जंगल, पहाड़, झरने और सियांग के सौंदर्य का सूक्ष्म से सूक्ष्म अवलोकन है।
यह यात्रा ईटानगर, दोइमुख, पासीघाट, यंगिस्तान, मेचुका व चीनी सीमा पर आखिरी भारतीय गाँव गेल्लिंग में आए सामयिक परिवर्तनों का तुलनात्मक अध्ययन सदृश्य है।
अरूणाचल की जीवन दायिनी नदी सियांग का अपने उद्गम से लेकर सागर में समाने तक की खोज, विभिन्न नाम आदि का विस्तृत वर्णन अध्याय यार्लुंग सांगपो से ब्रह्मपुत्र : पृष्ठभूमि में किया गया है।
सफरनामा के चौदह अध्याय अपने आप में अन्वेषणात्मक तथ्यों पर आधारित प्रामाणिक दस्तावेज है।
जब यात्रा में देशाटन, तथ्यात्मक खोज के साहित्यिक गतिविधियों का समामेलन होता है तो सुदूर क्षेत्रों में भी सुश्री यालम तातिन, जितेश अग्रवाल, सुश्री पुन्यित नितिक, सुश्री मिसा, डॉ विश्वजीत कुमार, सुश्री इंग परमे जैसे साहित्यिक मित्रों का सुखद सानिध्य प्राप्त हो जाता है। जिससे यात्रा अविस्मरणीय बन जाती है।
दयाराम वर्मा ने इस यात्रा में अरूणाचल प्रदेश के कण कण के सौंदर्य, माधुर्य और खुशबू को आत्मिक रूप से महसूस किया है। एक-एक पल को अंतरात्मा में उतारा है। और इसी कारण से छोटे से छोटे स्थान, छोटी से छोटी घटना व मुलाकात काे ब्रह्मपुत्र से सांगपो में लिपिबद्ध किया है।
वास्तव में यह सफरनामा हमारे जैसे यायावर के लिए टूर डायरी जैसा मार्गदर्शक है। पाठक के मन में अरूणाचल भ्रमण की हूक पैदा करने में सफल है। निश्चय ही यह सफरनामा पाठक जगत में निरंतर अपना सफर जारी रखने में सफल होगा।
हमेशा की तरह बोधि प्रकाशन जयपुर के द्वारा पुस्तक को पवित्र ग्रंथ की तरह आकर्षक और सुरुचिपूर्ण ढंग से मुद्रित किया है। हार्दिक बधाई बोधि प्रकाशन।
ॠषभ वर्मा द्वारा खींचा गया फोटो पुस्तक आवरण के रूप में बहुत आकर्षक है।
अंत में -
कुछ रिश्ते मात्र रिश्ते नहीं होते हैं बल्कि वे लहू बन शरीर में समावेशित रहते हैं। काश ऐसे रिश्तों की प्रगाढ़ता पूरी दुनिया को अपने आगोश में में ले ले।
मधुर कुलश्रेष्ठ
नीड़, गली नं 1
आदर्श कॉलोनी, गुना
पिन 473001
मोबाइल 9329236094

1 comment:
आदरणीय मधुर कुलश्रेष्ठ जी का आत्मीय आभार। आपकी समीक्षा पढ़कर स्पष्ट है कि आपने पुस्तक को अत्यंत बारीकी से पढ़ा है। आपने न केवल पुस्तक के सभी 14 अध्याय की सारगर्भित विवेचना प्रस्तुत की है बल्कि यात्रा के अंतर्निहित उद्देश्य को भी खूबसूरती से अनावृत किया है।
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