जन्म लेता है एक इंसान
और मौत होती है
हिन्दू या मुसलमान की
पर इस बीच
कितनी ही बार मौत होती है
इंसान की ।।
खोता बचपन
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मेरे होश संभालने से लेकर
आज होश गड़बड़ाने तक
कितनी बदल गई है दुनियाँ,
जंगल अब खिलखिलाते नहीं हैं
पेड़ पहले जैसे बौराते नहीं हैं
गाएं रंभाती नहीं हैं
और चिड़ियाँ चहचहाती नहीं हैं।
वयस्क तो वयस्क
अब बच्चे भी ठहठहाते नहीं हैं
कितनी बोझिल हो गई है जिंदगी
अगर यह सब यूँ ही चलता रहा
तो एक दिन
बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हो जाएगा
मुस्कुराना और ठहठहाना।
जगह जगह खुल जाएंगी
प्रयोगशालाएं और व्यायामशालाएं
जहाव
व्यावसायिकता भरे अंदाज में
विशेषग्यता के दर्प से दमकते हुए
विशेषग्य
सिखाएगें वैग्यानिक ढंग से मुस्कुराना
मुँह खुलने की नाप से लेकर
दाँत दिखाने तक की गिनती लिखी होगी फार्मूलों के रूप में।।
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