अपना अपना दर्द
झोपड़ी को दर्द है
कि वह कभी
अपना सिर उठाकर
सीना ताने
आसमान से बातें नहीं कर पाई
और महलों को दर्द है
कि वह हमेशा
अपना सारा अस्तित्व
समेट कर भी
धरती की गोद में
सिमटकर सोने में
नाकामयाब रहा है।
२, डर
जिंदगी अभावों में पलती है
या अभाव पलते हैं जिंदगी में
सड़क के किनारे
स्वेच्छा से बंधुआ बने हैं
टेलीफोन के तारों की लाइन खोदने वाले
मजदूरों के पूरे परिवार,
कतार से खड़े बगुलों के पैरों की तरह
लकड़ियों, सरकंडों की झीनी दीवारों पर
टिकी हैं उनके आश्रय की कमजोर छतें
रहते हैं उनमें
मजबूत कद काठी वाले मजदूर
कमजोर झोपड़ियों में रहकर भी
कहीं से कमजोर नहीं हैं
मजदूर, उनकी स्त्री और बच्चे,
आलीशान महलों में
मजबूत दीवारें हिलती रहती हैं हमेशा
और डरते रहते हैं
अभावों से
उनमें रहने वाले लोग
३, मजदूर
शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
लगी है हाट मजदूरों की
लोग आलू, प्याज की तरह
हाथों की मछलियाँ देख-देखकर
छाँट रहे हैं मजबूत मजदूर
ताकि मजदूर के पसीने की बूँदों से
चमक उठे
उनके सपनो का महल-
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