वाह रे पंडित
मैं
शहर की एक बदनाम गली से रहा था गुजर
मुझे नहीं पता
मैं वहाँ क्या रहा था कर
कभी आसमान झाँकता
कभी धरती की धूल फाँकता
हर तरफ रंगे पुते मुरझाए हुए चेहरे
अपनी बेबसी पर लगाए हुए
मुसकानों के पहरे
भड़कीले आवरणों में
भददे भददे इशारे
मूक आमंत्नण
बेबसी भरा निमंत्रण
मैं खोया अपने आप में
जाति पाँति की दीवारों से दूर
निराशाओं की घनी भाप में
गुजर रहा मौन मौन
नहीं समझ पा रहा था
बुला रहा था कौन कौन
और क्यों
कदम कदम पर मजहबी लेबल
फूँक फूँक कर अब कदम उठाना था मुझे
एक ओर
मुझे ज्यादा ही आकर्षकता नजर आई
दर्द की मासूमियत मुझे भायी
मुझे देखते ही
उसकी आँखें डबडबाईं
मैं
उसी ओर मुड़ गया
जिंदगी के गर्त में गिरते हुए
एक जीने की सीढ़ी चढ़ गया
आइए हुजूर;
एक स्वर ने मेरा स्वागत किया
मैंने
पहले एक प्रश्न दाग दिया
तुम्हारी जाति क्या है
और तुम्हारा मजहब क्या है
तुनक कर
वह बोली
"वाह रे पंडित"
इन दो शब्दों से मेरे कान झनझना गए
मुझको सर्द रातों में पसीने आ गए
उसकी आवाज का दर्द मुजे झलक गया
बिन सुने ही मैं सब कुछ समझ गया
मुझे सकपकाता देख
वह घबराई
मन में उसे
बाई की क्रोधित आँखें पड़ी दिखाई
नजदीक आकर
मेरी ओर अपनी बाहें फैलाईं
बोली
बाबू आज तुम पहली बार आए हो क्या
यहाँ की रंगीन फिजा में छिपी है खिजा
इन बदनाम गलियों में
हुस्न का बाजार सजता है
हुस्न के आगे तो
सारा संसार झुकता है
यहाँ का जाति-धर्म ने नहीं देखा है रास्ता
यहाँ तो हर किसी का है वासना से वास्ता
पंडे-पुजारी, मुल्ला मौलवी सभी आते हैं
बाहर के इंसान यहाँ हैवान हो जाते हैं
दीन-धर्म और मजहब सब बाहर हैं
आदमी और औरत भीतर हैं
गुंडे, बदमाश, पंडे-पुजारी, मुल्ला, मौलवी
हमारी चादर में आदमी हैं
बाहर दंगे फसाद कराने वाले
यहाँ पर
सब एक हैं
तुम हमारी जाति पूछते हो
हमने तो अपना अतीत भुला दिया है
सभी रिश्तोम ने हमें ही कलंकित कर
वेश्या बना दिया है
इंसानियत का तकाजा करने वाले
सच्चरित्र सफेद पोश
रातों को हमारी महफिलें रंगीन करते हैं
मुखौटों के अंदर न जाने कितने
मुखौटे औज निकलते हैं
इससे तो हम लोग ही अच्छे हैं
जो दिन के उजाले और रात के अंधेरों में
एक ही बात करते हैं
मुखौटे लगाने से भी डरते हैं
इन गंदी बसि्तयों में
इन गंदे शरीरों में
हमारी पवित्र आत्मा बसती है
लड़खड़ाती जिंदगियों में कुछ देर के लिए ही सही
खुशियों के रंग भरती है
तुम से विनती करती है
यह गंदी औरत
कि
तुम
इन गंदी गर्तों में न फँसो
समाज में रहकर
इंसान के रूप में इंसान बनकर ही जियो
चाहे चलना पड़
अकेले ही अकेले
1 comment:
what a good blog
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