Thursday, December 20, 2007

lost childhood

जन्म लेता है एक इंसान
और मौत होती है
हिन्दू या मुसलमान की
पर इस बीच
कितनी ही बार मौत होती है
इंसान की ।।

खोता बचपन
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मेरे होश संभालने से लेकर
आज होश गड़बड़ाने तक
कितनी बदल गई है दुनियाँ,
जंगल अब खिलखिलाते नहीं हैं
पेड़ पहले जैसे बौराते नहीं हैं
गाएं रंभाती नहीं हैं
और चिड़ियाँ चहचहाती नहीं हैं।

वयस्क तो वयस्क
अब बच्चे भी ठहठहाते नहीं हैं
कितनी बोझिल हो गई है जिंदगी

अगर यह सब यूँ ही चलता रहा
तो एक दिन
बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल हो जाएगा
मुस्कुराना और ठहठहाना।

जगह जगह खुल जाएंगी
प्रयोगशालाएं और व्यायामशालाएं
जहाव
व्यावसायिकता भरे अंदाज में
विशेषग्यता के दर्प से दमकते हुए
विशेषग्य
सिखाएगें वैग्यानिक ढंग से मुस्कुराना
मुँह खुलने की नाप से लेकर
दाँत दिखाने तक की गिनती लिखी होगी फार्मूलों के रूप में।।

Tuesday, October 30, 2007

अपना अपना दर्द

झोपड़ी को दर्द है
कि वह कभी
अपना सिर उठाकर
सीना ताने
आसमान से बातें नहीं कर पाई

और महलों को दर्द है
कि वह हमेशा
अपना सारा अस्तित्व
समेट कर भी
धरती की गोद में
सिमटकर सोने में
नाकामयाब रहा है।

२, डर
जिंदगी अभावों में पलती है
या अभाव पलते हैं जिंदगी में

सड़क के किनारे
स्वेच्छा से बंधुआ बने हैं
टेलीफोन के तारों की लाइन खोदने वाले
मजदूरों के पूरे परिवार,

कतार से खड़े बगुलों के पैरों की तरह
लकड़ियों, सरकंडों की झीनी दीवारों पर
टिकी हैं उनके आश्रय की कमजोर छतें
रहते हैं उनमें
मजबूत कद काठी वाले मजदूर

कमजोर झोपड़ियों में रहकर भी
कहीं से कमजोर नहीं हैं
मजदूर, उनकी स्त्री और बच्चे,

आलीशान महलों में
मजबूत दीवारें हिलती रहती हैं हमेशा
और डरते रहते हैं
अभावों से
उनमें रहने वाले लोग

३, मजदूर

शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
लगी है हाट मजदूरों की
लोग आलू, प्याज की तरह
हाथों की मछलियाँ देख-देखकर
छाँट रहे हैं मजबूत मजदूर
ताकि मजदूर के पसीने की बूँदों से
चमक उठे
उनके सपनो का महल-

Thursday, October 25, 2007

एक्सचेंज आफर
एक्सचेंज आफर, एक्सचेंज आफर
हर जगह मचा हुआ है शोर
ले आइए कोई भी
पुराना सामान, टी वी, फ्रिज, मोटरसाइकिल
ले जाइए उसके बदले बिल्कुल नया

गली मोहल्ले, नुक्कड़ों, पान की दुकान,
किटी मीटिंगों में
बदलो बदलो ने पकड़ लिया जोर
इस शोर में मैंने भी सोचा घनघोर
अपने घर की एक एक चीज को
पारखी नजरों से ताक ताक कर करने लगा बोर

पूरे घर में मुझे कोई भी
ऐसा सामान नहीं मिला
जिसको बदल कर
ले आता मैं भी सामान नया
और मोहल्ले में अपनी शान में कर लेता इजाफा

टी वी अपनी हालत पर शरमा रहा था
किसी टी वी के मरीज की तरह खरखरा रहा था

फ्रिज बरसों पुरानी कहानी कह रहा था
कछुए की चाल से चला जा रहा था

प्लासि्टक के सामान का कहना ही क्या
सेल से खरीदा था
इसलिए फेल फेल चिल्ला जहा था

ऐसे सामान को देखकर
मन मारकर मैं अपने आप पर
गुस्सा खा रहा था
कि मैंने ऐसा कोई सामान क्यों नहीं रखा
जिसको एक्सचेंज आफर के काम लाता

तभी मुझे
अपनी बीबी को देखकर
एक विचार आया
उदास मन में जीरो वाट का बल्ब जलाया

फिर तो
मैं पत्र-पत्रिकाओं, पेपर के
एक एक पेज को चाटने लगा
हो्र्डिंग्स, बैनरों पर आँखें फाड़ने लगा
कि शायद मुझे भी कहीं
एक एक्सचेंज आफर दिख जाए

"ले आइए कोई भी पुरानी बीबी
और ले जाइए एकदम नयी"

इन लाइनों को पढ़ने को
मेरा मन बेचैन रहने लगा
मैं भी अपनी पुरानी लेकिन अच्छी
बीबी की जगह
फैक्ट्री में बनी, साँचे में ढली,
एकदम नई बीबी के
सपनों में खोने लगा

Wednesday, October 24, 2007

wah rey pandit

वाह रे पंडित
मैं
शहर की एक बदनाम गली से रहा था गुजर
मुझे नहीं पता
मैं वहाँ क्या रहा था कर
कभी आसमान झाँकता
कभी धरती की धूल फाँकता
हर तरफ रंगे पुते मुरझाए हुए चेहरे
अपनी बेबसी पर लगाए हुए
मुसकानों के पहरे
भड़कीले आवरणों में
भददे भददे इशारे
मूक आमंत्नण
बेबसी भरा निमंत्रण

मैं खोया अपने आप में
जाति पाँति की दीवारों से दूर
निराशाओं की घनी भाप में
गुजर रहा मौन मौन
नहीं समझ पा रहा था
बुला रहा था कौन कौन
और क्यों
कदम कदम पर मजहबी लेबल
फूँक फूँक कर अब कदम उठाना था मुझे

एक ओर
मुझे ज्यादा ही आकर्षकता नजर आई
दर्द की मासूमियत मुझे भायी
मुझे देखते ही
उसकी आँखें डबडबाईं

मैं
उसी ओर मुड़ गया
जिंदगी के गर्त में गिरते हुए
एक जीने की सीढ़ी चढ़ गया

आइए हुजूर;
एक स्वर ने मेरा स्वागत किया
मैंने
पहले एक प्रश्न दाग दिया
तुम्हारी जाति क्या है
और तुम्हारा मजहब क्या है

तुनक कर
वह बोली
"वाह रे पंडित"

इन दो शब्दों से मेरे कान झनझना गए
मुझको सर्द रातों में पसीने आ गए
उसकी आवाज का दर्द मुजे झलक गया
बिन सुने ही मैं सब कुछ समझ गया

मुझे सकपकाता देख
वह घबराई
मन में उसे
बाई की क्रोधित आँखें पड़ी दिखाई
नजदीक आकर
मेरी ओर अपनी बाहें फैलाईं
बोली
बाबू आज तुम पहली बार आए हो क्या
यहाँ की रंगीन फिजा में छिपी है खिजा
इन बदनाम गलियों में
हुस्न का बाजार सजता है
हुस्न के आगे तो
सारा संसार झुकता है

यहाँ का जाति-धर्म ने नहीं देखा है रास्ता
यहाँ तो हर किसी का है वासना से वास्ता
पंडे-पुजारी, मुल्ला मौलवी सभी आते हैं
बाहर के इंसान यहाँ हैवान हो जाते हैं
दीन-धर्म और मजहब सब बाहर हैं
आदमी और औरत भीतर हैं
गुंडे, बदमाश, पंडे-पुजारी, मुल्ला, मौलवी
हमारी चादर में आदमी हैं
बाहर दंगे फसाद कराने वाले
यहाँ पर
सब एक हैं

तुम हमारी जाति पूछते हो
हमने तो अपना अतीत भुला दिया है
सभी रिश्तोम ने हमें ही कलंकित कर
वेश्या बना दिया है
इंसानियत का तकाजा करने वाले
सच्चरित्र सफेद पोश
रातों को हमारी महफिलें रंगीन करते हैं
मुखौटों के अंदर न जाने कितने
मुखौटे औज निकलते हैं

इससे तो हम लोग ही अच्छे हैं
जो दिन के उजाले और रात के अंधेरों में
एक ही बात करते हैं
मुखौटे लगाने से भी डरते हैं

इन गंदी बसि्तयों में
इन गंदे शरीरों में
हमारी पवित्र आत्मा बसती है
लड़खड़ाती जिंदगियों में कुछ देर के लिए ही सही
खुशियों के रंग भरती है

तुम से विनती करती है
यह गंदी औरत
कि
तुम
इन गंदी गर्तों में न फँसो
समाज में रहकर
इंसान के रूप में इंसान बनकर ही जियो
चाहे चलना पड़
अकेले ही अकेले